अँधेरा : उजाले के बाद की सच्चाई

आज दफ्तर में बड़ा ही अजीब सा माहौल था। हमारे एक साथी का जन्मदिन मनाया गया और वही दूसरे साथी की विदाई समारोह। मैं थोड़ा परेशान था, क्योंकि मैं यह तय ही नहीं कर पा रहा था की अपने उस साथी की विदाई पर मैं दुःखी होउ या फिर खुश। दुःख इस बात का था की अब हम साथ काम नहीं कर पाएंगे और खुशी इस बात की थी की वह अब अपने रास्ते पर आगे बढ़ चुका था। तरक्की और ऊँचाइयाँ उसका स्वागत करने के लिए बाहें फैलाई खड़ी हैं। भगवान करें वह जहां भी जाये तरक्की करें और सफलता हासिल करें और मुझे यकीन है वह करेगा।


candle burning in the dark

इन सारे हंगामों के बाद हम लोगों ने अपना बचा हुआ काम भी खत्म किया और फिर एक-दो घंटे गप्पें मारने के बाद अपने-अपने घर को निकाल लिए। जब मैं घर आया तो देखा की हमारे यहाँ की बिजली गुल थी। आम तौर पर पटना में ज्यादा बिजली गुल होने की समस्या नहीं होती थी। और ऐसा भी नहीं था की ये बहुत दिनों बाद हुआ हो। पर आज जब मैंने अपने कमरे में मोमबत्ती जलायी तो मुझे अपने पुराने दिन याद आने लगे।

kerosin lampसीतामढ़ी एक छोटा सा शहर है, वहाँ ये समस्या कोई बड़ी बात नहीं है और न ही मेरे लिए हुआ करती थी। अँधेरों के हम आदि हो गए थे। मुझे आज भी याद है जब हम खेल कर शाम को घर लौटते थे तो माँ एक लैम्प और एक लालटेन जला कर रखती थी। चार कमरों के दुतल्ले मकान में एक तरफ कहीं कोने में लालटेन उजाला कर रहा होता था तो दूसरी तरफ लैम्प की रौशनी में हम दोनो भाई पढ़ते थे। माँ वही बगल में बैठ कर खाने की तैयारी करती और हमें पढ़ने के लिए डांटती रहती। लैम्प की रौशनी लालटेन से ज्यादा होती थी। इसलिए हम लैम्प की रौशनी में पढ़ाई करते और माँ लालटेन की रौशनी में हमारे लिए खाना पकाती। जब बिजली आती तो हमारी खुशी का ठिकाना न रहता था। ऐसा लगता मानो किसी प्यासे को पीने का पानी मिल गया हो।

आज मुझे पटना में रहते करीब ढाई साल से ज्यादा हो चुका है। मैंने इससे पहले भी दो साल बोकारो में बिताए थे जहां बिजली की समस्या तो न के बराबर थी। उजाले की इस चकाचौंध में मैं अंधेरे को तो भूल ही गया था। पर मेरे सामने जलती हुई इस मोमबत्ती ने मुझे आज उस सच्चाई से अवगत कराया जो शायद मैं भूल चुका था। और वह थी उजाले के बाद की सच्चाई यानी “अँधेरा”। अंधेरे का भी अपना मज़ा है, कभी ये हमें डराता है तो कभी ये हमारे बेचैन दिल को सुकून भी देता है।

जिस तरह पानी का महत्व प्यास की वजह से है, अच्छाई का बुराई की वजह से, देवों का दानवों की वजह से, उसी तरह उजाले का महत्व भी अंधेरे की वजह से ही है। हर इंसान में भी उजाला और अँधेरा होता है, उसके व्यक्तित्व में। और हमें इन दोनों के साथ किसी इंसान को अपनाना चाहिए। वरना किसी न किसी दिन, जब हमारी मुलाक़ात अपने अंधेरे से होगी, तो फिर हम अपने आप से ही नज़रें नहीं मिला पाएंगे।

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अँधेरा : उजाले के बाद की सच्चाई” पर 2 विचार

  1. बहुत खूब!! मेरे बचपन के दिन याद आ गए| वो लालटेन की रोशिनी में पढ़ाई करना और गर्मी में परेशान होना, वो भी क्या दिन थे|

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  2. I too remember when I used to study on my house terrace under night lamp and the Sunday evening movie. The light usually used to go off when it used to be 7:30 in evening. We used to wait for it to come again so that we could complete the movie. One thing is for sure, life earlier was more happier than today with so less distractions around and we all used to be happier even in those dark hours which now seems unbearable to all of us.

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