दार्जिलिंग यात्रा : एक अनोखा और रोमांचक सफर – भाग १

दार्जिलिंग एक ऐसा शहर जिसके बारे में मैंने सिर्फ पढ़ा या सुना ही था। दार्जिलिंग, जिसे पहाड़ों की रानी (The Queen of Hills) भी कहा जाता है। बंगाल की उत्तरी छोर पर लगभग 6500 ft. की ऊँचाई पर बसा ये शहर दुनिया भर में न सिर्फ चाय की खेती के लिए बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी मशहूर है।

Ankesh and Amit on Darjeeling Tripमुझे घूमना या यूं कहे की नई जगहों पर जाना पसंद है, पर मैंने ये कभी नहीं सोचा था की मुझे दार्जिलिंग जाने का मौका मिलेगा वो भी इतनी जल्दी। अभी तो मैंने अपने पैरो पर खड़ा होना शुरू ही किया है। ऑफिस में हम लोग कहीं घूमने जाने का विचार कर रहे थे। पहले हमारा रेणुकोट जाने का विचार हुआ था, और इसका प्रस्ताव हमारे ही ऑफिस के एक मित्र अंशु ने रखा था, पर किसी वजह से हमें अपना विचार बदलना पड़ा। तब शंकर सर ने ही दार्जिलिंग का प्रस्ताव रखा और उसे निश्चित कर लिया गया। मेरी समस्या अब कुछ ज्यादा बढ़ चुकी थी, हाला की मुझे घूमना पसंद है पर घूमने के लिए आपके पास उतने पैसे भी तो होने चाहिए। मुझे इतना तो पता था की रेणुकोट से ज्यादा खर्च दार्जिलिंग जाने में पड़ेगा, पर अब जब सब ने तय कर ही लिया था तो फिर क्या था। मैं भी अपने तैयारियों में लग गया। रही खर्च की बात तो मैंने पहले ही शंकर सर से कह दिया था की मेरा हाथ इस महीने थोड़ा तंग है, इस लिए मैं सारे पैसे तो नहीं दे पाऊँगा। पर सर ने सारा मामला संभाल लिया, जिसकी वजह से मेरा इस यात्रा पर जाना संभव हो पाया। इसके लिए मैं उनका हमेशा आभारी रहूँगा।

Manish, Ankesh, Chandrakant, Anshu and Shankar Sir from left to right27 जून 2014, आखिर वो दिन आ ही गया जिसका हम सबको बड़ी बेसब्री से इंतजार था। शुक्रवार को हमने जल्दी-जल्दी अपना काम खत्म किया और 5 बजे तक हमारी गाड़ी ऑफिस के दरवाजे पर खड़ी थी। आज हम अपना समान अपने साथ सुबह ही ऑफिस ले कर आ गए थे। हम कुल सात लोग इस यात्रा पर निकले थे, मैं, शंकर सर, संतोष सर, मनीष जी, अंशु, चंद्रकांत और अंकेश। अब हम पटना से दार्जिलिंग के इस अदभुत सफर पर निकल चुके थे। हालांकि जाते वक्त हमारे मन में अभी भी एक दूसरे के लिए संकोच था या यूं कहे की हम अभी एक दूसरे से ज्यादा खुले हुए नहीं थे, सो ज्यादा मजा कर नहीं पाये। पर फिर भी सफर अच्छा कट रहा था और रास्ते में दो लोगों (शंकर सर और मनीष जी) को छोर कर सभी सो गए थे। भगवान की कृपा ये थी की मनीष जी ने एक बड़ा हादसा होने से बचा लिया। हमारे ड्राईवर को नींद आ गयी थी गाड़ी चलते वक्त और इससे पहले की कोई हादसा होता मनीष जी और शंकर सर ने गाड़ी रोकवा कर उसे एक घंटे के लिए सोने को कहा ताकि हम सही सलामत दार्जिलिंग तक पहुँच सके।

हमारा सफ़र फिर शुरू हुआ, अब हम लोग सिलीगुड़ी पार कर रहे थे। और सुबह रास्ते में जो नजारा गाड़ी से देखने को मिल रहा था वह तो लाजवाब था। अभी हम लोग दार्जिलिंग पहुंचे भी नहीं थे और नजरों ने अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया था। उस वक्त मेरे जेहन में बार-बार मुकेश जी का वह गीत आ रहा था “सुहाना सफर और ये मौसम हसीन, हमें डर है हम खो न जाए कहीं”। और फिर हमलोग सचमुच में खो गए, तब हमने दार्जिलिंग की ओर जा रही रेल की पटरियों को ही अपना गाइड बना लिया। और फिर क्या था हमारा रोमांचक सफर अब शुरू हो चुका  था। हमें कोई अंदाजा नहीं था की दार्जिलिंग जाने का रास्ता इतना खतरनाक हो सकता था। जैसे-जैसे हम रास्तों में आगे बढ़ रहे थे, रास्ते छोटे और संकरे होते जा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो हम हर कदम मौत के तरफ ही बढ़ रहे हो। दो तीन जगहों पर जब गाड़ी को उस खतरनाक पहाड़ी रास्ते पर घूमना पड़ता था तो हमारा कलेजा मुंह को आ जाता था। मैं तो फिर भी जहां डर लग रहा था गाड़ी में से कूद कर बाहर निकाल जा रहा था। अंकेश और शंकर सर की हालत मुझसे ज्यादा खराब थी। उन्हें तो मौत के दर्शन 52 इंच के अल्ट्रा HD स्क्रीन पर हो रहे थे। वे गाड़ी में पीछे बैठे थे जहाँ का दरवाजा खोल कर वे कूद भी नहीं सकते थे। फिर वही के एक बंदे ने हम लोगों को ऊपर दार्जिलिंग तक पहुँचाने के लिए 500 रुपये मांगे और हम लोगों ने भी बिना कुछ ज्यादा सोचे समझे और मोल भाव किए बिना हाँ कर दिया। क्योंकि जान है तो जहान है, हमारा ड्राईवर उस रास्ते में नया था और हम अब कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे। लगभग 11:00 AM बजे तक हम लोग दार्जिलिंग पहुँच चुके थे।

अब हमारे रोमांचक सफर का एक भाग यहाँ खत्म हो चुका था।

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